मानस गाते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने निरूपण किया
कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक |
होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक ||
अर्थात ज्ञान कहने (समझाने) में कठिन, समझने में कठिन और साधने में भी कठिन है। यदि घुणाक्षर न्याय से (संयोगवश) कदाचित् यह ज्ञान हो भी जाए, तो फिर (उसे बचाए रखने में) अनेकों विघ्न हैं |जिस सृष्टि नियामक का वर्णन करते हुए साक्षात् मानसीय व्यास को ये कहना पड़े, उस विराट का वर्णन हम जैसो के बस की बात कहाँ, फिर भी बच्चा बाप के कंधे पर बैठ कर हठ वश या प्रेम वश किसी सत्य,किसी प्रेम या कदाचित किसी करुणा की अनुलिपि अवश्य कर लेता है | ये लेख वैसा ही एक प्रयास है | 'कर्षति इति कृष्ण' अर्थात जो आकर्षित कर दे वो कृष्ण,यदि कुछ समझ आ जाये तो भी वो पूर्ण परमेश्वर है और यदि कुछ भी समझ ना आये तो भी वो पूर्ण नारायण ही है | 'धर्म', आधुनिक काल में एक ऐसा शब्द है जिसका वर्णन आत्मसात करना तो दूर, उसे वर्णित करना ही बड़ा कठिन है, धर्म की परिभाषा जिसे आज पंथ और जाती जाना जाता है, उसका निरूपण कदाचित परम परमेश्वर श्री कृष्ण ने गीतोपदेश में अर्जुन को समझाया और वो भी उस काल खण्ड में जिसमे धर्म केवल व्यक्ति के निजी क्रियान्वयन पर निर्धारित था, न की किसी मतावलम्ब का अनुसरण |
कर्ण' महाभारत का एक ऐसा योद्धा है जिसमे उन सारे गुणों का समावेश है जो कदाचित द्रौपदी को मिले उस वरदान को पूर्ण करता है जिसमे महादेव से वो पांच गुणों वाले पतियों का प्रसाद मांगती है | द्रौपदी की ये भी इच्छा यदा कदा देखने और पढ़ने को मिलती है की पांच शूरवीर पतियों को पाने के उपरांत भी वो कर्ण का चिंतन किया करती थी | तो क्या कारण था की इतने गुणों का समावेश होते हुए भी एक सूर्यपुत्र केवल एक सूतपुत्र बन के रह गया एवं दुर्भाग्य का ही स्वाद चखता रहा ? कदाचित कर्ण उस धर्म का पालन कर रहा था जो उसका था ही नहीं, कर्ण अधर्मी नहीं है किन्तु परधर्मी अवश्य है | दुर्योधन के ऋण के प्रत्यावर्तन में कर्ण ने ये ध्यान ही नहीं दिया की परधर्मी होकर ऋण उतारने से श्रेयकर उसका ऋणी रह जाना ही है, श्री कृष्ण ने कर्ण के इस आचरण को निष्ठा का रोग कहा है |
दूसरी ओर अर्जुन एक ऐसा योद्धा है जिसे उस काल ने सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर की उपाधि प्रदान की,किन्तु उसपर भी विरोधी मतों की कोई कमी नहीं है | प्रायः एकलव्य और कर्ण के सामर्थ्य तथा द्रोणाचार्य के पक्षपात की बातें की जाती हैं किन्तु एक योद्धा के नाते ये समझना वांछनीय है की जब अर्जुन और कर्ण जैसे योद्धाओं के पास असीम सामर्थ्य की पूंजी हो तो उस योद्धा में शील, अनुराग तथा स्वधर्म पालन की चेष्टा का होना अनिवार्य है | अर्जुन इन कसौटियों पर अपने समकालीन योद्धाओं से कहीं आगे निकल जाता है और कदाचित यही कारण है कि व्यास की लेखनी जो केवल सत्य के समक्ष नतमस्तक हुई, गांडीवधारी गुणाकेष सव्यसांची अर्जुन को स्पष्ट रूप से सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी होने की घोषणा कर देती है | वो सर्वश्रेष्ठ इसलिए भी है क्यूंकि उसे मिली शिक्षा का उसने सदैव अनुसरण किया है, वो शिक्षा जो कहती है , ' स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ' अर्थात स्वधर्ममें स्थित पुरुषका मरण भी श्रेष्ठ है क्योंकि दूसरे का धर्म भयदायक है |
उस काल में इन दो महान योद्धाओं (कर्ण और अर्जुन) से सीधे संवाद करने का उत्तरदायित्व उस कुल के वयोवृद्ध पितामह भीष्म को था, एक ओर स्वधर्म, दूजी ओर परधर्म तथा एक छोर पर फन काढ़े बैठा दुर्योधन और दुःशासन का अधर्म, पितामह की दशा का वर्णन कर पाना कठिन ही नहीं अपितु साधारण मानव के लिए असंभव है | प्रायः प्रश्न ये भी उठ सकता है कि संवाद तो श्री कृष्ण को भी करना पड़ा था तो केंद्र में तो श्री कृष्ण भी हो सकते थे ,किन्तु मेरा मत भिन्न है ,हाँ सत्य है की गिरिधर को इन सभी से संवाद स्थापित करना पड़ा परन्तु गोविन्द को कहाँ कोई धर्म बाँध सकता है, श्री कृष्ण हैं अवश्य केंद्र बिंदु किन्तु सभी बांधारणों से मुक्त है,धर्म से भी परे, अधर्म से भी परे इसलिए श्री कृष्ण को सदैव धर्मातीत कहा गया है | श्री कृष्ण को इस बात की चिंता ही नहीं की कौन उन्हें अधर्मी कहेगा, सत्य का आचरण करने वाला अथवा तो असत्य का आचरण करने वाल कहेगा | ' अश्वत्थामा हता इति ' कहलवाया श्री कृष्ण ने किन्तु कलंकित हुए धर्मराज युधिष्ठिर, कौरव पक्ष के सारे महारथी स्थूल चक्षुओं को दिखने वाले छल की ही बलि चढ़े किन्तु श्री कृष्ण उसे सूक्ष्म धर्म का अवलम्बन मानते हैं |
(अब इस सूक्ष्म धर्म की व्याख्या अगले अंक में.... )

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ReplyDeleteये पढ़ने में समय लगा , और समझने में भी ! तुम्हारा लेखन श्रेष्ठ है -- आज के युग में किसी नौजवान को ऐसा लिखते देख विस्मय होता है, दिल से प्रशंसा निकलती है --
ReplyDeleteलेख से कई ऐसे प्रश्नो का उत्तर मिला जो मैं बचपन से पूछता था .... हालाँकि कुछ बातों में अब भी मन पूरी तरह संतुष्ट नहीं है --
निम्न वाक्य ही देखो --
द्रौपदी की ये भी इच्छा यदा कदा देखने और पढ़ने को मिलती है की पांच शूरवीर पतियों को पाने के उपरांत भी वो कर्ण का चिंतन किया करती थी ( उस चिंतन को कृष्ण ने कदापि द्रौपदी के चरित्र का दोष नहीं माना,ये उस काल के विकसित समाज का भी द्योतक है ) है )
उस युग में ये पाप से कम नहीं था -- आज भी, ऐसी बात मन से स्वीकार नहीं होती, बस इसे एक विकार की तरह ही स्वीकार करना पड़ता है ------- तो फिर इसे उस काल के "विकसित समाज का भी द्योतक" कहना क्या ठीक है ?
बहुत से सन्दर्भ ऐसे हैं जिन्हे मैंने बस जाने दिया, क्यूंकि उनके उत्तर कभी मिले नहीं , कभी उनपर आमने सामने बात करेंगे
तुम्हारे आने वाले लेख की प्रतीक्षा रहेगी
उत्कृश्ट लेखन के लिए अनेकानेक आशीर्वाद
अशोक शर्मा
बहोत बहोत धन्यवाद सर जी
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