सूक्ष्म धर्म

(गतांक से आगे......)


धर्म,सत्य,सदाचार,पुण्य,पाप,असत्य आदि शब्दों का अर्थ उनका निरूपण तथा उनकी व्याख्या प्रायः बड़ी उलझी हुई होती है | हमने कई बार सुना है की शास्त्रों का हलन्त भी असत्य नहीं होता, क्या अभिप्राय है इसका ? हमारी कठिनाई ही यही है की हम शास्त्र को मानते है पर शास्त्र की नहीं मानते हैं | हमारे लिए हमारे शास्त्र एक ऐसी अलौकिक वस्तु है जिसे किसी पवित्र वस्त्र में आभूषित कर हम संतोषानुभव करते हैं | क्या है सत्य की परिभाषा,क्या है धर्म ,क्या है सदाचरण,कौन परिभाषित करेगा ? चार वेद, १८ पुराण, ब्रम्हसूत्र तथा अनेको दर्शन शास्त्रों के विस्तार के उपरांत भी जब ' श्री कृष्णद्वैपायन व्यास ' संतुष्ट न हुए तो उन्होंने महान काव्य ' महाभारत ' की रचना की और घोषणा कर दी,



धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ |
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित् ॥

अर्थात: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जो इस महाकाव्य (महाभारत) में कहा गया है, वह संसार में है, और जो कुछ भी यहां नहीं कहा गया है वह संसार में न है,न संभव है |

इसलिए आइये इस चिरंजीवी महाकाव्य का शिरोबिंदु सम्बल लेकर आगे चलते हैं | कोई कार्य धर्म है या अधर्म इसे कैसे वर्णित करेंगे ? उस कार्य की नियमावली व आचरण से या उसके परिणाम से ? काशीराज की कन्या अंबा का हरण (विचित्रवीर्य से विवाह के प्रयोजन से) भीष्म ने किया, किन्तु अंबा ने जब भीष्म के सम्मुख विवाह प्रस्ताव रखा तब देवव्रत भीष्म ने उसे अपने आजीवन ब्रम्हचर्य की प्रतिज्ञा के कारण अस्वीकार कर दिया,वही तिरस्कृत अंबा दूसरे जन्म में शिखंडी के रूप में भीष्म  के बाणों की शरशैया का कारण बनी | वर्णित है की अपने व्रत का पालन करने के लिए भीष्म के दैदीप्यमान व्यक्तित्व को सराहना मिली किन्तु परिणाम ? क्या भीष्म ने अधर्म किया ? विचार कीजिये...

दूसरी ओर गांडीवधारी अर्जुन जो एक वर्ष के लिए ब्रम्हचर्य व्रत का पालन कर रहा है, अरण्य में घूमते हुए नागकन्या उलूपी उससे विवाह का आग्रह करती है,और आग्रह ठुकराए जाने पर आत्मदाह की चेतावनी देते हुए उलूपी कहती है कि ," हे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर निर्णय करो की तुम्हारा ब्रम्हचर्य व्रत अधिक महत्त्वपूर्ण है या एक स्त्री जो तुमसे प्रेम करती है उसका जीवन ? " परिणामस्वरूप अर्जुन उलूपी से विवाह करता है तथा महाभारत युद्ध के उपरांत अश्वमेध यज्ञ में जब बब्रुवाहन (चित्रांगदा पुत्र) द्वारा अर्जुन की हत्या हो जाती है तो अर्जुन को जीवित करने के लिए उलूपी नागमणि का प्रयोग करती है तथा अर्जुन को पुनः जीवित कर देती है | अब यदि धर्म का आधार परिणाम को माना जाए,तो अर्जुन का उलूपी से विवाह का निर्णय एक कुशल निर्णय है | इस प्रकार की अनेकों घटनाएँ हमे इस महाकाव्य में मिलती हैं जो सूक्ष्म धर्म का निरूपण करती हैं, उपर्युक्त दोनों घटनाओं पर विचार कीजिये..............

कदाचित इसी कारणवश गीतोपदेश देते समय कृष्ण कहते हैं कि," हे पार्थ ! धर्म की एक एक परत का ज्ञान बड़ा ही जटिल तथा उसका अति सूक्ष्म निरूपण अत्यंत कठिन है | धर्म प्रतिपल परिवर्तित होता है ,धर्म का स्वरुप भी बदलता रहता है ,एक समय में जो कृत्य धर्म है दूसरे पल वही कृत्य अधर्म का स्वरुप ले लेता है | इसलिए धर्म और अधर्म के बीच की रेखा यदाकदा बड़ी धूमिल सी होती है | कदाचित यही कारण है की कृष्ण ने सत्य से अधिक धर्म को महत्व दिया है ,सत्य स्थिर होता है और धर्म परिवर्तनशील, तो संसार जो सदैव परिवर्तित हो रहा है उसे केवल सत्य की  कसौटी पर कैसे मापा जा सकता है | परोक्ष रूप से दिखने वाले असत्य का आचरण कर के भी यदि सूक्ष्म धर्म का पालन होता है तो वो असत्य भी धर्म ही कहा जायेगा | 

इन महाकाव्यों की एक विचित्र स्थिति ये है ,कि ये कदापि आपको किसी एक सत्य, एक सिद्धांत या किसी एक उद्देश्य तक ही सिमित नहीं रखते | यहाँ तक तो फिर भी उचित है किन्तु ये कदापि किसी परिणाम पर समाप्त भी नहीं होते अपितु इन महाकाव्यों का रसस्वादन करने के उपरांत पथिक और भी अधिक प्रश्नो के सागर में डूबने लगता है ,कृष्ण ने ज्ञान का स्रोत कहते हुए अर्जुन को यही  कहा "प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया",अर्थात ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रश्न अनिवार्य हैं | प्रश्न कितने महत्वपूर्ण हैं इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है की विभिन्न उपनिषदों में एक उपनिषद् प्रश्नोपनिषद् भी है और वो कहता है ' यथाकामं प्रश्नान् पृच्छत ' प्रश्न करो..... प्रश्न करो...... आप भी विचार कीजिये और प्रश्न करते रहिये .......

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