प्रेम ईश्वर को प्राप्त करने की सबसे सहज विधा है। जिसे प्रेम हो वो अन्य किसी वस्तु की अभिलाषा ही नहीं रखता। वह राग-द्वेष, हर्ष-विषाद से परे हो जाता है। प्रेम स्वार्थ नहीं बल्कि परमार्थ है। श्रीमद्भागवत महापुराण जो एक विशुद्ध प्रेम शास्त्र है, उद्घोषित करता है, कि यदि प्रेम सीखना है तो गोपियों से सीखें। कृष्ण से दूर रहते हुए भी वे उनसे प्रेम करती है। वे जानती हैं कि अब कृष्ण हमको कभी नहीं मिल सकते तब भी उनका प्रेम कम नहीं हुआ। अपने आपको कृष्ण के सुख स्वास्थ्य के लिए न्यौछावर करने को तत्पर रहती हैं। प्रेम सुदामा से सीखने जैसा है, जो विपन्न होते हुए भी अपने प्रियतम कृष्ण से मिलने नहीं जाते। कारण कि वह कुछ दे देगें तो व्यवहार कहा जाने लगेगा।
प्रेम और स्नेह के बिना ईश्वर ने किसी को यहाँ जन्म ही नहीं दिया,सम्पदा दाता ने सबको दी है किन्तु स्वार्थवश निर्मल चित्त नहीं हो पाता, इसीलिए वो शाश्वत प्रेम न हम किसी व्यक्ति से कर पाते है और न ईश्वर से | तो प्रेम प्रगट कैसे हो? क्या तप से, यज्ञ से, ज्ञान से, चिंतन से, ध्यान से ?
तप तो हिरण्यकश्यपु ने बहुत किया, कदाचित संसार में कोई कर पाए इतना तप किया, किन्तु इस व्यक्ति को कभी प्रेम नहीं मिला उसके लीलाक्षेत्र में, कोई प्रमाण नहीं, हां तप हमको एकदम पवित्र कर दे,शुद्ध कर दे हो सकता है, किन्तु तप से प्रेम की प्राप्ति हो ऐसी भूल नहीं करनी चाहिए, सहायक हो सकता है तो अच्छी बात है| यज्ञों से भी प्रेम मिलना कठिन है| सौ-सौ यज्ञ करता है इंद्र और इन्द्रपद मिल जाता है किन्तु प्रेम नहीं मिलता है, इंद्र रो रह है रामचरितमानस में, इंद्र कहता है, "मोहि रहा अति अभिमान,नहिं कोउ मोहि समान"
हे प्रभु ! मुझे इतना अभिमान रहा की मेरे समान कोई नहीं है त्रिलोक में, क्या नहीं मिला मुझे यज्ञों से, मैं सुरेश बन गया सुरपति बन गया नागपति बन गया, न जाने क्या नहीं मिला मुझे यज्ञों से, किन्तु अब समझ में आया की जो चाहिए वो नहीं मिला, प्रेम नहीं प्रगट हुआ| इसलिए मेरी अब एक ही मांग है कि मैं भले इन्द्रासन पर विराजूं पर मेरे ह्रदय में आपका निवास हो और हे प्रभु! आप मुझे अपना दास समझिये "मोहि जानिए निज दास,दे भक्ति रमानिवास" तो सिद्ध हो जाता है की यज्ञों से भी प्रेम नहीं मिलता |
उद्धव कृष्ण से आग्रह करते है विरह में व्याप्त गोपियों को ज्ञान के दृष्टिकोण से समझाने को, किन्तु ये कार्य कृष्ण ने उद्धव को ही दे दिया और विपरीत परिणाम ये हुआ की उद्धव ने ही गोपियों से आग्रह किया की वो उनकी गुरु बन जाए, गोपियों ने उद्धव से कहा," जब अक्रूर वृन्दावन आये तो वो हमसे हमारे कान्हा को ले गए और अब आप हमसे गोविन्द की स्मृतियाँ भी लेने आये हैं ", उद्धव निरुत्तर हो गए| ज्ञान ने प्रेम के समक्ष अभ्यर्पण कर दिया, ज्ञान निरुत्तर था | चिंतन और ध्यान की अधिकता भी ह्रदय के लिए ग्राह्य बन जाती है वो भी उतना ही सत्य है |
श्रीमद्भागवत वर्णित करता है,कि प्रेम तो तभी प्रत्यक्ष होता है जब हम श्री कृष्ण को अपना समझ ले | बड़ी साधारण सी बात लगती है किन्तु गूढ़ है, हमारे शरीर में रोग भरे हैं किन्तु अपना है इसलिए हमे बहुत प्रेम है | पुत्र अपंग है, कुरूप है, फिर भी दीर्घायु, चिरायु, माँ गले लगा लेती है क्यूंकि अपना है| जिसने भी उस प्रियतम को पूर्णतया से पाया है केवल प्रेम से ही पाया है, चाहे राधा हो, रुक्मणि या मीरा, इन सभी सेविकाओं ने कृष्ण से स्वछंद सम्बन्ध निर्भीक होकर बनाये और प्रेम तो अभय का सर्वोच्च कीर्तिमान है|
"अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः" का वास्तविक अनुसरण तो इन प्रेमिकाओं ने ही किया है|
अपनत्व की भावना आती है सम्बन्ध जोड़ने से, इसलिए जिसे भी प्रेम की मांग हो वो जोड़ दे सम्बन्ध उस कृष्ण से, मैं तेरा तू मेरा.......तोहे मोहे नाते अनेक,मानिये जो भावे......

अलौकिक विस्तार वर्णन
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteबहुत सुन्दर।
ReplyDeleteSuperb
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