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"अब तो दूसरा प्रहर भी बीत चला है, मुझे अपने साथ आये सैनिकों की सुध भी नहीं रही, कदाचित उत्तर दिशा की ओर कुछ अधिक ही आ गया हूँ, आखेट की आकांक्षा और उसकी तत्परता ने मुझे एक निर्जन स्थान में ला पटका आज तो, किन्तु अब प्यास से गला सूख गया है| आखेट के लिए तीस सैनिकों की टुकड़ी साथ लेकर चला था, किन्तु मेरे अश्व का आवेग और दिशाभ्रम ने मुझे उन सबों से अलग थलग कर दिया है|"
अपने विचारों की उधेड़बुन में "मणिद्वीप" नरेश सम्राट "वृष्णिवर्धन" कुछ शिथिल और श्रमित अनुभव कर रहे थे| घोड़े से उतर उसकी बागडोर अपने हाथ में लेकर कुछ दूर पैदल चलने का निर्णय लिया, आधा कोस चलने के उपरांत उन्हें एक नदी के कल-छल करती हुई ध्वनि की आहट आई, सहसा एक सुख की अनुभूति हुई, वे और गतिशील हो उस जलस्रोत के समीप गए| वो दृश्य सुखदाई और आनंद से भरा हुआ था| ऐसा लगा जैसे किसी ने पृथ्वी पर गोलोक वन की उत्पत्ति कर दी हो| चारो ओर एक सघन अरण्य जो अपनी विशिष्ट हरियाली व अदृष्टपूर्व सौंदर्य से इतरा रहा था| एक ओर जहाँ अनेको रंग व प्रकार की तितलियाँ अप्रतीम सी लग रही थी, वहीँ दूसरी ओर भौंरों का एक झुण्ड मानो आपस में ये विमर्श कर रहा था, कि ये कौन विशिष्ट अतिथि है जो हमसे मिलने आया है और मानो वे आपस में द्वन्द कर रहे हों की हम इन्हे मधुपर्क का भोग परोसेंगे| बाग, व उनपर लदी हुई लतायें,मौलश्री, अनार, आलूबालू, साहुल आदि | मन व रसना को लुभाने वाली अनेकों लताएँ व फलों का समूह नरेश को आह्लादित कर गया|
आत्मा की प्रशान्तता का रसास्वादन कर एक आतंरिक संतोषानुभव हुआ| "आहा ! जल की शीतलता हर उस व्यक्ति के लिए अमृत ही है चाहे वो किंकर हो या सम्राट, पहले तो मैं अपनी तृष्णा बुझाता हूँ और अपने अश्व को भी ये शीतल जल पिलाता हूँ| इसके उपरांत विचार करता हूँ की अपने सैनिकों तक सन्देश कैसे भेजूं " अपने मन में ये विचार लाते हुए सम्राट वृष्णिवर्धन ने उस जलस्रोत से अपनी पिपासा शांत की तथा उन मीठे फलों का भोग पाया ,सम्राट ने उस समग्र अरण्य को ईश्वर द्वारा दिया गया आशीर्वाद ही माना|
वहां कुछ घड़ी विश्राम करता हुआ सम्राट इस सुखपूर्वक दृश्य को देख मन में एक अत्यंत संतोष की ध्वनि का अनुभव कर रहा था, उसे ऐसा लगा की इस आत्मानंद की अनुभूति तो उसने कभी अश्वमेध विजय के उपरांत भी नहीं की | इस कुंज में अन्य वनो की भांति भय नहीं अपितु सरसता है, प्रशान्त नाद है, आत्मा का विश्राम है , बाह्य नहीं अपितु आतंरिक नृत्य है, प्रेम है|
ये अनुभव कदाचित उसे पहली बार हो रहा था, होना ही था| अपने मन को शांत पाकर उसके मन में स्वयं से प्रश्न करने की इच्छा हुई| "जो अनुभव मुझे आज जीवन में पहली बार हो रहा है क्या वही वास्तविक सुख है, आनंद है, ये जो अनायास प्रेम की प्रवृत्ति मुझमे पनप रही है, क्या ये अप्रायोजित प्रेम ही समदर्शी प्रेम है ? इस क्षण में मुझे परम सात्त्विकता का आभास हुआ है| प्रकृति कितनी गूढ़, विराट व दयालु होती है ", अपने मन में इन्ही सुन्दर विचारों और प्रश्नो को दोहराता प्रसन्नचित सम्राट अपने अश्व समेत उस अरण्य में आगे बढ़ता हुआ चलने लगा|
कुछ दूर चलने के उपरांत राजा ने एक दिव्य आश्रम देखा। आश्रम के शांत और पवित्र वातावरण ने राजा के हृदय को और भी सात्त्विकता और असीम शांति से भर दिआ |
आश्रम में प्रवेश करते ही, राजा की दृष्टि एक अद्वितीय सौंदर्य से युक्त ऋषिका पर पड़ी। उसकी दिव्यता और आकर्षण ऐसा था मानो साक्षात प्रकृति ने स्वयं को उसकी देह में मूर्त रूप दे दिया हो।वह आश्रम की शांति में बसने वाली, एक दिव्य आभा से घिरी थी। उसकी आँखें मानो किसी गहरे सागर का रहस्य समेटे हुए थीं—नीलिमा से भरी, शीतल, और आत्मा को झकझोर देने वाली। जब वह देखती, तो ऐसा प्रतीत होता जैसे समय ठहर गया हो, जैसे किसी प्राचीन ऋषि की तपस्या का प्रकाश उनमें समाया हो। उसका सौंदर्य सादा था, पर उसी सादगी में एक अनुपम मोहकता थी। न माथे पर कोई अलंकार, न वेशभूषा में कोई चमत्कार—फिर भी, उसका तेज किसी चंद्रकिरण की भाँति निर्मल और आकर्षक था। धीमे कदमों से चलते हुए भी वह मानो किसी आध्यात्मिक संगीत की लय में बह रही थी। उसके अधरों पर सदैव एक कोमल मुस्कान रहती, जो मन में असीम शांति और अनुराग भर देती। आश्रम की आरती के दीप जब टिमटिमाते, तब उसकी आँखों में भी वैसी ही ज्योति झिलमिला उठती—एक ऐसी ज्योति, जो केवल देखने भर से मन में श्रद्धा और प्रेम का संचार कर दे।
वह एक ऐसी प्रतिमा थी, जिसे स्वयं विधाता ने दिव्य स्पर्श से गढ़ा था—उसका हर अंग एक श्लोक की भांति, एक रहस्य से भरी कविता गा रहा था| उसका मुख चंद्रमा की शीतल आभा सा दमकता था, पर उसमें एक ऐसी रहस्यमयी तपस्या थी, जो किसी योगिनी के ध्यान में पिघल चुकी हो। उसके अधर—मानो किसी अर्चना के लिए खिलता गुलाब, कोमलता और माधुर्य से भीगे हुए, जिन पर टिकती धूप भी अपना ताप खो दे। जब वे हल्के से हिलते, तो ऐसा लगता जैसे किसी मंत्र का स्पंदन लहरों में घुल रहा हो।
उसकी गर्दन लंबी और स्निग्ध थी, जैसे किसी शिवलिंग पर लहराती जलधारा, जो शुद्धता और सौंदर्य का संगम लिए बह रही हो। उसके कंधे किसी योगिनी की दृढ़ता के प्रतीक थे—मृदुल फिर भी सामर्थ्य से भरे, जैसे किसी समाधिस्थ देवी की शक्ति को धारण करने के लिए बनाए गए हों।
उसका उरोज-भाग सौंदर्य और सात्विकता का सजीव संगम था, पूर्णता से भरा, परंतु मर्यादा में लिपटा हुआ। ऐसा लगता जैसे किसी आध्यात्मिक रहस्य का उदय वहीं से होता हो—न कामना से बंधा, न किसी वासना से कलंकित, बल्कि शुद्धता की एक ऊँची लहर, जो आकर्षण से परे भी अद्भुत थी। उसकी कटि—एक तरंगित क्षितिज, एक मंत्र की लय जैसी, जो भीतर तक एक मोहक शांति भर दे। उसकी चाल—धीमी, लयबद्ध, मानो किसी मंदिर के प्रांगण में दीपमालिका झिलमिला रही हो। उसके नितंब सुडौल, मृदुल और मोहक थे, पर किसी साध्वी की मर्यादा में ढके हुए, किसी देवी की प्रतिमा की भाँति, जो सौंदर्य को छिपाकर भी चमत्कृत कर दे।
उसकी जंघाएँ किसी ऋषि की काव्य-कल्पना का साकार रूप लगतीं—सघन, स्निग्ध, और उर्जस्विता से भरी हुईं। और उसके चरण... वे केवल धरती को छूते नहीं थे, बल्कि हर स्पर्श से उसे पवित्र कर देते थे। ऐसा लगता, जैसे जब वे चलती तो धरा स्वयं झुककर उनका आलिंगन करना चाहती हो।
उसकी संपूर्ण काया वासना से परे थी, फिर भी एक दिव्य आकर्षण से भरपूर। उसमें एक अनकहा रहस्य था—एक ऐसा सम्मोहन, जो देह से आगे आत्मा तक पहुँच जाता। वह केवल सुंदर नहीं थी, वह स्वयं सौंदर्य की परिभाषा थी—एक ऐसी माया, जिसमें मोक्ष भी था और माधुर्य भी।
राजा ने श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और दृढ़ स्वर में कहा, "हे तपस्विनी, तुम्हारा तेज मुझे मोह रहा है। मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ।" ऋषिका ने धैर्यपूर्वक उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में न कोई चकित भाव था, न कोई अस्वीकार का संकेत। वह जैसे सब कुछ पहले से जानती हो। मंद मुस्कान के साथ उसने उत्तर दिया, "राजन, यदि तुम सच में मुझसे विवाह करना चाहते हो, तो दो परीक्षाएँ तुम्हारी राह देख रही हैं।" राजा ने विनम्रता से कहा, "जो भी कठिनाई आए, मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा। बताइए, आपकी शर्तें क्या हैं?"
ऋषिका ने तपस्वी भाव से कहा, "प्रथम, तुम्हें इस आश्रम में तीन वर्षों तक एक साधक की भांति रहना होगा। और दूसरा, इस अवधि में तुम्हें मेरा नाम ज्ञात करना होगा। यदि तीन वर्षों के भीतर तुम मेरा नाम पहचान सको, तो मैं विवाह के लिए सहमत हो जाऊँगी।"
राजा हृदय से इस अनुरोध को स्वीकार कर चुका था। वह उसी क्षण अपने राजसी वस्त्रों को त्यागकर एक साधारण वसन धारण कर तपस्वियों के बीच रहने लगा, तथा अपने राज्य, मणिद्वीप में, दूत द्वारा एक आदेश भिजवाया, कि इन तीन वर्षों में राज्य का कार्यभार उसका अनुज सम्हाले तथा उसे इन तीन वर्षो के प्रवास में विक्षुब्ध ना किया जाए। राजा ने प्रथम वर्ष में अपने हर प्रयास को नाम जानने की दिशा में केंद्रित किया। प्रतिदिन वह अलग-अलग नामों से ऋषिका को पुकारता, किंतु उत्तर में सदैव एक ही स्वर सुनाई देता— "सखी"
आश्रम की हर ऋषिका, हर साध्वी, एक-दूसरे को केवल सखी कहकर संबोधित करती थी। न कोई नाम, न कोई विशिष्ट पहचान—केवल सखी ! एक ऐसी परंपरा जो आत्मा को देह की सीमाओं से परे ले जाती थी। दूसरे वर्ष तक राजा इस खेल को समझ चुका था, किंतु फिर भी हार नहीं मानता था। वह अपने ध्यान, सेवा, और तपस्या में लीन हो चुका था। उसके भीतर अब केवल विवाह की इच्छा नहीं थी, बल्कि ऋषिका के इस दिव्य रहस्य को जानने की एक जिज्ञासा भी जन्म ले चुकी थी।
तीसरे वर्ष में, राजा के हृदय में शांति का संचार हो चुका था। वह अब पहले की तरह अधीर नहीं था। तपस्या ने उसे भीतर से परिष्कृत कर दिया था। अब वह केवल ऋषिका का नाम जानने का प्रयास नहीं कर रहा था, बल्कि उसे अनुभव कर रहा था।
तीन वर्ष पूर्व, जब राजा इस आश्रम में आया था, तब वह केवल एक संकल्प लेकर आया था—विवाह करने का। किंतु अब, जब वह विदा लेने को खड़ा था, तब उसकी यात्रा केवल एक नश्वर बंधन तक सीमित नहीं थी, बल्कि आत्मा के गहरे सागर में उतर चुकी थी। तीन वर्षों तक, वह ऋषिका के नाम की खोज करता रहा। प्रतिदिन एक नया नाम, एक नया प्रयास, पर उत्तर सदा एक ही आता—"सखी !"
वह समझ चुका था कि यह जीवन के सत्य तक पहुँचने की एक साधना थी। किन्तु अब समय पूरा हो चुका था। शर्त के अनुसार, वह अब यहाँ और नहीं रह सकता था। हृदय में दिव्यता की आभा थी, पर साथ ही एक गहरी पीड़ा भी—वह नाम न जान सका, वह ऋषिका को साक्षात पहचान न सका। उसने भारी मन से अपने वस्त्र सँवारे, अपनी आँखों में भरे प्रेम को भीतर समेटा और विदा लेने को तत्पर हुआ। ठीक उसी क्षण, ऋषिका आगे बढ़ी। उसकी चाल में वही दिव्य सौंदर्य था, उसकी आँखों में वही असीम शांति। उसने बड़े स्नेह से राजा की ओर देखा और मृदु स्वर में पूछा—
"राजन, अब आप क्या करेंगे ?"
राजा, जो पहले जीवनभर युद्ध और राज्य का भार उठाने वाला योद्धा था, अब एक शांत तपस्वी की भाँति खड़ा था। उसने गहरी श्वास ली, और अत्यंत शांत भाव से उत्तर दिया—
"देवि, अब मैं अपने देश लौटूँगा। परंतु जाने से पहले मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूँ। ये तीन वर्ष मेरे जीवन के सबसे दिव्य और प्रेमपूर्ण वर्ष रहे हैं। मैंने यहाँ केवल तपस्या नहीं की, मैंने प्रेम को नए रूप में जाना है। अब मैं वह व्यक्ति नहीं रहा, जो तीन वर्ष पहले यहाँ आया था।किन्तु मेरे हृदय में एक कसक रह गई है।
मैं यहाँ श्रद्धा लेकर आया था, पर अब मैं एक अनंत प्रतीक्षा लेकर जा रहा हूँ—एक ऐसी प्रतीक्षा, जो जीवनभर बनी रहेगी। मेरा हृदय इस सत्य को स्वीकार कर चुका है कि मैं अपना शेष जीवन आपके साथ नहीं बिता सकता, किंतु मैं यह भी जानता हूँ , कि मेरा प्रेम अब समय और सीमाओं से परे हो चुका है। बस, यही एक विषाद है कि मैं यहाँ से चला जाऊँगा, परन्तु मेरी आत्मा सदा यहीं अटकी रहेगी।"
राजा की वाणी सुनकर ऋषिका के अधरों पर एक मधुर मुस्कान खिली—पहली बार, जब उसने अनुभव किया कि राजा अब प्रेम के वास्तविक स्वरूप को समझ चुका था, एक ऐसा प्रेम जो देह से परे आत्मा का मिलन था। और दूसरी बार, जब उसने जाना कि राजा ने अनजाने में ही उसकी दूसरी शर्त पूरी कर दी थी।
राजा ने कभी न सोचा था कि वह इस नाम-रहस्य को सुलझा सकेगा, किंतु नियति ने अपनी लीला कुछ ऐसे रची थी कि अंततः सत्य स्वयं उसके शब्दों में प्रकट हो गया था। ऋषिका की आँखें अब भी शांत थीं, पर उनमें एक नई कोमलता झलक रही थी—एक ऐसा प्रेम, जो वर्षों तक उसने भीतर ही भीतर समेट रखा था, एक ऐसा अनुराग, जिसे उसने कभी उजागर नहीं किया था।
कुछ क्षणों के गहरे मौन के पश्चात, ऋषिका ने स्नेहसिक्त स्वर में कहा—
"यदि ऐसा है राजन, तो आपको अब अपनी रानी को साथ लिए बिना जाने की अनुमति नहीं है। यह किसी महान सम्राट के लिए उचित नहीं कि वह अपनी अर्धांगिनी को अकेला छोड़कर चला जाए।"
राजा, जो अब तक अपने विचारों में स्थिर और शांत था, सहसा चौंक उठा। उसकी आँखों में विस्मय भर आया। उसने दुविधा से देखा और कहा—
"परंतु... मैंने तो आपकी दूसरी शर्त पूरी ही नहीं की। मैं आपका नाम नहीं जान सका।"
यह सुनते ही ऋषिका के नेत्रों में प्रेम की दिव्य ज्योति कौंध उठी। वर्षों से भीतर रोका हुआ स्नेह अब सहज ही छलक उठा। उसकी पलकें भीग गईं, और अश्रु धारा बनकर उसके कपोलों पर ढुलकने लगे। उसकी वाणी प्रेम और प्रतीक्षा से भर उठी—
"इतनी प्रतीक्षा के पश्चात... क्या अब अपनी "प्रतीक्षा" को अपनी जीवन संगिनी बनाकर नहीं ले चलेंगे?"
राजा स्तब्ध रह गया। अचानक, उसके भीतर वर्षों का संदेह, असमंजस, और पीड़ा एक क्षण में विलीन हो गए। वह समझ चुका था—उसकी प्रतीक्षा केवल एक भावना नहीं थी, यह उस ऋषिका व अब सम्राट की होने वाली रानी का वास्तविक नाम भी था।
वर्षों पहले जब उसने इस यात्रा की शुरुआत की थी, तब वह केवल ऋषिका के बाह्य सौंदर्य पर मोहित हो उससे विवाह का इच्छुक एक सम्राट था। लेकिन अब, वह प्रेम और आध्यात्म की संपूर्णता को पाने वाला एक साधक था।
उसने आगे बढ़कर ऋषिका को अपने आलिंगन में भर लिया—एक ऐसा आलिंगन, जिसमें प्रेम भी था, भक्ति भी, और एक अनंत प्रतीक्षा का संपूर्ण होना भी।
अब कोई प्रश्न शेष नहीं था। अब कोई यात्रा अधूरी नहीं थी। राजा और ऋषिका—अब केवल दो आत्माएँ नहीं, बल्कि एक ही चेतना का हिस्सा बन चुके थे। दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में वह गूढ़ प्रेम देखा, जो अब तक मौन था, पर सदा से वहाँ था।
अब राजा अकेले नहीं था। अब उसकी प्रतीक्षा सदा के लिए पूर्ण हो चुकी थी।
Bahut Sundar
ReplyDeleteThank you
DeleteWhat an amazing writeup Vaibhav ...
ReplyDeleteWaah.....
ReplyDeleteThank you..
DeleteThis story takes you to a different world....Loved it... ❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
ReplyDeleteWhen I was reading this story,I felt as if i am watching some indian mythology serial,something like Shakuntala and Dushyant....Nicely crafted....
ReplyDeleteAhaa....superb. Amazingly drafted.
ReplyDeleteWaaoo Vaibhav Ji...amazing
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