रेत का महल और खारा पानी


मुझे आज भी उस क्लास रूम की खिड़की से आती धूप याद है। बारहवीं कक्षा का वो कमरा, जहाँ हवा में सिर्फ़ ब्लैकबोर्ड की चॉक की महक नहीं, बल्कि हमारे आने वाले कल के ख़्वाब भी तैरते थे। बेंच पर बीच में तृप्ति बैठती थी, उसके दाईं तरफ़ अनंत और बाईं तरफ़ मैं—ऐश्वर्य शास्त्री। हम तीन दोस्त, जो एक-दूसरे के लिए दुनिया थे। लेकिन त्रिप्ति के लिए शायद मैं उससे कुछ अधिक था। बहुत अधिक। कई बार अध्यापक पढ़ा रहे होते और मैं महसूस करता कि कोई मुझे देख रहा है। मानो उसने अपने मन ही मन मुझे अपना सर्वस्व, अपना जीवनसाथी मान लिया हो।उन कुछ क्षणों में मैं उसकी आँखों में जो देखता था, वह किसी किशोर आकर्षण से कहीं बड़ा था।उसकी आँखों में एक घर था। एक विश्वास था। एक ऐसा अपनापन, जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है। जैसे उसने मन ही मन वर्षों पहले ही तय कर लिया हो कि उसका जीवन मेरे नाम लिखा जा चुका है।
अनंत हमारी इस खामोश मोहब्बत का सबसे बड़ा गवाह और सबसे बड़ा शरारती तत्व था। वह बात-बात पर तृप्ति को चिढ़ाता, दोनों के बीच नोकझोंक होती, पर हमारा याराना 'एक सबके लिए, सब एक के लिए’ जैसा था।
समय गुज़रा।स्कूल समाप्त हुआ। कॉलेज शुरू हुआ। त्रिप्ति को कम्प्यूटर साइंस मिल गई थी, बहुत अच्छा भविष्य था उसका। लेकिन एक दिन उसने सहज भाव से बताया कि उसने अपनी शाखा बदल ली है।
"इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग?"
मैं चौंक गया। "तुम पागल हो गई हो क्या?" वह हँसी। "क्यों?"
"तुम्हें कम्प्यूटर साइंस मिली थी।"
"मिली थी।"
"तो छोड़ी क्यों?"
उसने मेरी ओर देखा। बहुत गहराई से।
और फिर धीरे से कहा—"क्योंकि तुम इलेक्ट्रिकल में हो।"
उस दिन पहली बार मुझे अपने महत्व का नहीं, उसके प्रेम की गहराई का एहसास हुआ। किसी व्यक्ति के लिए अपना भविष्य बदल देना...यह साधारण बात नहीं होती।
तीसरे साल आते-आते वो अक्सर मुझसे शादी और हमारे भविष्य के बच्चों के सपने साझा करने लगी थी। कभी अचानक पूछती—"हमारी बेटी होगी तो किस पर जाएगी?"
कभी कहती—"तुम्हें कितने बच्चे चाहिए?"
मैं हँसता, भागने की कोशिश करता।लेकिन वह पूरी गंभीरता से भविष्य जी रही थी।
उसके लिए विवाह कोई संभावना नहीं था, वह एक निश्चित सत्य था।
उसी कॉलेज में एक साल बाद अनंत ने भी जॉइन कर लिया और उसकी बदमाशी पहले जैसी ही रही।हर रक्षाबंधन पर जब तृप्ति अनंत की कलाई पर राखी बांधती, तो अनंत मुस्कुराते हुए कहता, "देख तृप्ति, मेरा तोहफा यही होगा कि अगर यह ऐश्वर्य कभी तुझे छोड़कर भागने की कोशिश करेगा, तो मैं खींचकर लाऊँगा और तुम दोनों की शादी करवाऊँगा।" वह अक्सर हंसते हुए कहता, "देखना तृप्ति, यह ऐश्वर्य शास्त्री तुम्हें एक दिन बीच राह में छोड़ जाएगा।"
मैं नाराज़ हो जाता। "तू हर साल यही क्यों बोलता है?" वह हँस देता। त्रिप्ति तकिया उठाकर उसे मारती। और हम तीनों हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते। कौन जानता था कि ईश्वर भी कहीं बैठकर यह दृश्य देख रहा होगा। और शायद चुपचाप मुस्कुरा भी रहा होगा।
कॉलेज समाप्त हुआ।नौकरियाँ लगीं।सबसे पहले त्रिप्ति का चयन हुआ। लेकिन उसकी सबसे बड़ी चिंता उसकी नौकरी नहीं थी।
वह मैं था, उसका करियर नहीं।उसका भविष्य नहीं, बस मैं।
आज जब दुनिया में लोग प्रेम से अधिक विकल्पों को महत्व देते हैं...जब रिश्ते विश्वास से अधिक शर्तों पर टिके होते हैं...जब लोग प्रेम के नाम पर स्वतंत्रता और दूरी की परिभाषाएँ गढ़ते हैं...तब मुझे लगता है कि त्रिप्ति शायद किसी और युग की लड़की थी। उसकी दुनिया का केंद्र मैं था। और मैं उसकी दुनिया।
कुछ महीनों बाद मुझे भी नौकरी मिल गई। एक राष्ट्रीय कच्चे तेल की कंपनी में। सीनियर एनर्जी एनालिस्ट, समुद्र के बीच स्थित प्लेटफॉर्म। हेलिकॉप्टर यात्राएँ, जोखिम भरा काम। रोमांच से भरा जीवन। मुझे वह जीवन बहुत पसंद था। लेकिन त्रिप्ति को हमेशा डर लगता था।वह हर बार पूछती— "सुरक्षित रहोगे न?" और मैं हर बार हँसकर कहता— "मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाने वाला।"
मैं अपने ऑफ़ के दिनों में पुणे जाकर तृप्ति के साथ वक्त बिताता। जिंदगी किसी हसीन ख़्वाब जैसी चल रही थी। फिर परिवारों को मनाने का दौर शुरू हुआ और इस पूरे अभियान का सेनापति था—अनंत। मुझे लगा था कि घरवालों को मनाने में वर्षों लग जाएँगे, लेकिन अनंत ने जैसे कोई जादू कर दिया। जब त्रिप्ति पहली बार दीवाली पर मेरे घर आई तो मेरी माँ पहले से ही उसके पक्ष में थीं। दादी उसे देखकर मुस्कुरा रही थीं। माँ उसे रसोई दिखा रही थीं। और मैं दूर खड़ा यह सब देख रहा था। मुझे लगा जैसे मेरा घर पूरा हो गया हो।त्रिप्ति बार-बार कहती—"ऐश्वर्य, मैं तुम्हें तुमसे ज़्यादा प्यार करती हूँ”, मैं हमेशा हँस देता। लेकिन शायद वह सच कहती थी। क्योंकि मैंने कभी किसी को किसी से इतना प्रेम करते नहीं देखा।
आज भी मुझे उसकी मुस्कान याद है।आज भी मुझे उसकी आवाज़ सुनाई देती है।आज भी मैं उसे देखता हूँ। लेकिन अब वह पहले जैसी नहीं रही, अब उसकी आँखों में हमेशा नमी रहती है।अब वह रक्षाबंधन पर अनंत को राखी नहीं बाँधती। वह उससे नाराज़ रहती है। बहुत नाराज़, क्योंकि अनंत का वह पुराना मज़ाक अब उसके दिल में तीर बनकर चुभता है। वह रोते हुए उससे पूछती है—"तुम हर साल क्यों कहते थे कि ऐश्वर्य मुझे छोड़ देगा?" अनंत कुछ नहीं बोलता, बस सिर झुकाकर बैठा रहता है, सूखे वृक्ष की तरह, निष्प्राण।
और मैं दोनों को देखता रहता हूँ, अपने दो सबसे प्रिय लोगों को।दो ऐसे लोगों को जो कभी मेरी वजह से हँसते थे, और आज मेरी वजह से रोते हैं। जीवन अजीब है। वह हमें एक चलचित्र का ट्रेलर दिखाता है। और जब पूरी फिल्म शुरू होती है, कहानी कुछ और निकलती है। हम सोचते हैं कि अब सब ठीक है।अब सब मिल गया, अब बस औपचारिकताएँ बाकी हैं। लेकिन नियति हमारी योजनाएँ नहीं पढ़ती, वह अपना लेख स्वयं लिखती है।
कभी-कभी रात को मैं त्रिप्ति को देखता हूँ, वह मेरी तस्वीर के सामने बैठी होती है, अनंत उसके पास बैठा होता है। दोनों चुप, दोनों टूटे हुए, दोनों अधूरे।और तब मुझे लगता है...अनंत सही था। मैं सचमुच त्रिप्ति को बीच रास्ते में छोड़ गया। हालाँकि मैंने कभी ऐसा नहीं चाहा था। मैंने तो उससे वादा किया था कि अंतिम साँस तक साथ रहूँगा। लेकिन शायद समस्या यही थी।मेरी अंतिम साँस बहुत जल्दी आ गई|
2022 में अरब सागर के ऊपर उड़ते उस हेलिकॉप्टर में, मैं भी भविष्य के सपने देख रहा था। त्रिप्ति, शादी, माँ, दादी, अनंत, हमारे बच्चे, हमारा घर, हमारा जीवन, फिर अचानक एक झटका, एक चीख, टूटता हुआ आकाश। और उसके बाद केवल सन्नाटा, उस दिन समुद्र में सिर्फ एक हेलिकॉप्टर नहीं गिरा था।किसी लड़की का पूरा भविष्य गिर गया था, किसी दोस्त की आधी आत्मा टूट गई थी।
और मैं...मैं वहीं समाप्त हो गया था।शायद इसलिए वर्षों से मैं यही स्मृतियाँ बार-बार जीता हूँ। क्योंकि मेरे पास अब भविष्य नहीं है, मेरे पास केवल यादें हैं।
मैं ऐश्वर्य शास्त्री हूँ।और यह मेरी कहानी नहीं...मेरे बाद बची हुई दो ज़िंदगियों की कहानी है। क्योंकि मेरी कहानी तो 2022 में समाप्त हो चुकी थी, जिस दिन मेरी आत्मा ने मेरे शरीर का साथ छोड़ दिया था...

और मेरी त्रिप्ति तथा मेरा मित्र अनंत इस जन्म के लिए मुझे खो बैठे थे।

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